देश में चीनी की बढ़ती कीमतों ने सरकार की चिंता बढ़ा दी है। घरेलू बाजार में सप्लाई पर दबाव के बीच केंद्र ने करीब एक दशक बाद 10 लाख टन कच्ची चीनी के ड्यूटी-फ्री आयात की अनुमति दी है। यह आयात 31 अक्टूबर 2026 तक किया जा सकेगा।
चीनी की कीमतों में पिछले कुछ समय में तेज बढ़ोतरी हुई है। सरकार के आंकड़ों के मुताबिक 18 अगस्त को खुदरा कीमत करीब ₹52.30 प्रति किलो थी, जो एक साल पहले ₹46.34 प्रति किलो थी। वहीं एक्स-मिल कीमत भी पिछले साल के मुकाबले काफी ऊपर पहुंच गई है।
मामला इसलिए भी अहम है क्योंकि अगस्त से नवंबर के बीच देश में त्योहारों के चलते चीनी की मांग बढ़ जाती है। गणेश चतुर्थी, दशहरा और दिवाली के दौरान मिठाइयों और अन्य खाद्य उत्पादों की मांग बढ़ने से बाजार पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।
सरकार ने सिर्फ आयात का फैसला ही नहीं लिया है। बड़े स्तर पर चीनी इस्तेमाल करने वाले संस्थानों के लिए भी स्टॉक रखने की सीमा तय की गई है। 1 सितंबर से 30 नवंबर तक हर महीने 10 टन से ज्यादा चीनी इस्तेमाल करने वाले बड़े उपभोक्ता अधिकतम 15 दिन की जरूरत के बराबर स्टॉक रख सकेंगे। इसका मकसद बाजार में जमाखोरी रोकना और उपलब्ध चीनी की सप्लाई बनाए रखना है।
इसी बीच कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने चीनी की कीमतों और घटते स्टॉक को लेकर केंद्र सरकार पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने पूछा कि दुनिया के बड़े चीनी उत्पादक देश होने के बावजूद भारत को विदेश से चीनी आयात करने की जरूरत क्यों पड़ रही है। उन्होंने एथेनॉल नीति को लेकर भी सरकार से सवाल किया।
हालांकि सरकार ने चीनी की कीमत बढ़ने के लिए सिर्फ एथेनॉल उत्पादन को जिम्मेदार मानने से इनकार किया है। सरकार के मुताबिक कम उत्पादन, मौसम का असर और त्योहारों से पहले बढ़ती मांग समेत कई वजहों से कीमतों पर दबाव आया है। मौजूदा सीजन में चीनी उत्पादन का अनुमान भी पहले के अनुमान से कम किया गया है।
अब सरकार की नजर इस बात पर है कि ड्यूटी-फ्री आयात से बाजार में अतिरिक्त सप्लाई कितनी जल्दी पहुंचती है और इसका असर चीनी की कीमतों पर कितना पड़ता है। आने वाले त्योहारों से पहले कीमतों को स्थिर रखना सरकार के लिए बड़ी चुनौती बनी हुई है।