राजस्थान में नगर निकाय चुनाव को लेकर भाजपा और कांग्रेस ने टिकट वितरण की रणनीति में बड़ा बदलाव किया है। दोनों दल कई वार्डों में उम्मीदवारों की सूची सार्वजनिक करने के बजाय सीधे अधिकृत प्रत्याशी को चुनाव चिन्ह देने की तैयारी में हैं। इस रणनीति का मुख्य उद्देश्य टिकट वितरण के बाद होने वाली पार्टी के अंदर की बगावत और विरोध को रोकना माना जा रहा है।
BJP में दिनभर चली बैठकों का दौर
भाजपा प्रदेश मुख्यालय जयपुर में 28 अगस्त को निकाय चुनाव की तैयारियों को लेकर संभागवार और जिलावार बैठकें हुईं। बैठकों में संभावित प्रत्याशियों के नामों के साथ-साथ वार्डवार राजनीतिक समीकरण, बूथ स्तर पर संगठन की सक्रियता और चुनावी रणनीति पर चर्चा की गई।
इन बैठकों में मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा, प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़, प्रदेश महामंत्री संगठन अजय कुमार, निकाय चुनाव प्रभारी हरीश द्विवेदी समेत कई वरिष्ठ नेता मौजूद रहे। अलग-अलग संभागों के नेताओं और पदाधिकारियों से स्थानीय स्थिति को लेकर फीडबैक लिया गया।
उम्मीदवारों की सूची जारी करने के बजाय सीधे मिलेगा सिंबल
सूत्रों के मुताबिक भाजपा कई वार्डों में प्रत्याशियों की अंतिम सूची सार्वजनिक नहीं करेगी। पार्टी में जिन नामों पर सहमति बनेगी, उनकी जानकारी संबंधित जिला अध्यक्ष और विधायक को भेजी जाएगी।
इसके बाद अधिकृत उम्मीदवार को जिला कार्यालय बुलाकर पार्टी का चुनाव चिन्ह सौंपा जाएगा। जिन क्षेत्रों में रायशुमारी पूरी हो चुकी है, वहां निकाय प्रभारियों को प्रदेश अध्यक्ष के हस्ताक्षर वाले खाली सिंबल भी दिए जाने की जानकारी सामने आई है।
नाम फाइनल होने के बाद जिला अध्यक्ष और विधायक को इसकी जानकारी दी जाएगी। इसके बाद संबंधित प्रत्याशी को पार्टी का अधिकृत चुनाव चिन्ह सौंप दिया जाएगा।
बूथ स्तर पर भी BJP की तैयारी
भाजपा की बैठकों में केवल टिकट वितरण पर ही चर्चा नहीं हुई। पार्टी ने बूथ स्तर पर संगठन को मजबूत करने और कार्यकर्ताओं के बीच बेहतर तालमेल बनाने पर भी जोर दिया।
कार्यकर्ताओं को बूथवार जिम्मेदारियां देने और सरकार की योजनाओं व उपलब्धियों को जनता तक पहुंचाने की रणनीति पर भी चर्चा हुई। भाजपा निकाय चुनाव को संगठन की जमीनी ताकत परखने के अवसर के रूप में देख रही है।
कांग्रेस भी अपना सकती है यही फॉर्मूला
भाजपा की तरह कांग्रेस भी कई वार्डों में उम्मीदवारों के नाम सार्वजनिक करने के बजाय सीधे पार्टी सिंबल देने की रणनीति पर काम कर रही है।
खासकर उन वार्डों में जहां टिकट को लेकर दावेदारों के बीच विवाद या खींचतान है, वहां कांग्रेस उम्मीदवारों की सूची जारी करने से बच सकती है। ऐसे मामलों में अधिकृत प्रत्याशी या संबंधित रिटर्निंग ऑफिसर तक पार्टी का सिंबल पहुंचाने की तैयारी है।
कांग्रेस ने कई जिलों में जिलाध्यक्षों को सिंबल भेजना भी शुरू कर दिया है। हालांकि, जिन वार्डों में टिकट को लेकर पूरी सहमति है, वहां प्रत्याशियों के नाम सामान्य तरीके से घोषित किए जा सकते हैं।
बगावत रोकने के लिए रणनीति
निकाय चुनाव में टिकट वितरण के बाद सबसे बड़ी चुनौती पार्टी के भीतर होने वाली बगावत होती है। एक ही वार्ड से कई दावेदार होने के कारण टिकट नहीं मिलने पर कुछ नेता निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव मैदान में उतर जाते हैं।
ऐसे में उम्मीदवारों की सूची सार्वजनिक नहीं करने से पार्टी अंतिम समय तक नाम को गोपनीय रख सकती है। इससे टिकट को लेकर होने वाले विरोध और बगावत को सीमित करने की कोशिश की जा रही है।
स्थानीय समीकरणों पर भी नजर
विधानसभा और लोकसभा चुनावों के मुकाबले निकाय चुनावों में वार्ड स्तर की राजनीति और स्थानीय समीकरण काफी महत्वपूर्ण होते हैं। उम्मीदवार की व्यक्तिगत पकड़, स्थानीय प्रभाव और दावेदारों के बीच समीकरण चुनाव परिणाम पर असर डाल सकते हैं।
इसी वजह से भाजपा और कांग्रेस अंतिम समय तक प्रत्याशी का नाम गोपनीय रखते हुए सीधे पार्टी सिंबल देने के विकल्प पर भरोसा कर रही हैं।
अब देखना होगा कि उम्मीदवारों की सूची सार्वजनिक किए बिना सीधे चुनाव चिन्ह देने की यह रणनीति दोनों पार्टियों के लिए कितनी कारगर साबित होती है और टिकट के दावेदारों के बीच असंतोष व बगावत को कितना रोका जा सकता है।