जुलाई 2026 में भारत की थोक महंगाई दर (WPI) मामूली घटकर 9.78% हो गई, जबकि जून में यह 9.87% थी। यानी एक महीने में थोक महंगाई में 0.09 प्रतिशत की कमी आई है। हालांकि, इस मामूली राहत के बावजूद खाने-पीने की चीजों और फैक्ट्री में बनने वाले सामानों की कीमतों में बढ़ोतरी जारी रही।
खाने-पीने की चीजों की महंगाई बढ़ी
जुलाई में WPI फूड इंडेक्स की महंगाई दर बढ़कर 6.65% हो गई, जो जून में 6.14% थी। इसका मतलब है कि खाद्य वस्तुओं की थोक कीमतों पर दबाव बढ़ा है। सब्जियां, अनाज और अन्य खाद्य वस्तुओं के महंगे होने का असर आगे चलकर आम लोगों के घरेलू बजट पर भी पड़ सकता है।
1. कच्चा सामान और खाद्य वस्तुएं
प्राइमरी आर्टिकल्स की महंगाई दर जून के 7% से बढ़कर जुलाई में 8.52% हो गई। इस श्रेणी में खाद्य वस्तुओं के अलावा कच्चा माल और अन्य प्राथमिक वस्तुएं शामिल होती हैं।
अगर सब्जियों, अनाज, दूध और दालों जैसी वस्तुओं की थोक कीमतें लंबे समय तक बढ़ती हैं, तो इसका असर धीरे-धीरे खुदरा बाजार और रसोई के बजट पर दिखाई दे सकता है।
2. ईंधन और बिजली में राहत
ईंधन और बिजली की महंगाई दर में जुलाई में कुछ राहत मिली। यह जून के 27.41% से घटकर 20.05% हो गई।
पेट्रोल, डीजल, गैस और बिजली की कीमतों में थोक स्तर पर महंगाई की रफ्तार कम होने से परिवहन और उत्पादन लागत पर दबाव घट सकता है। इसका फायदा आगे चलकर कुछ सामानों की कीमतों में स्थिरता के रूप में दिखाई दे सकता है।
3. मैन्युफैक्चर्ड प्रोडक्ट्स भी महंगे
फैक्ट्रियों में बनने वाले सामानों की थोक महंगाई दर जून के 7.48% से बढ़कर जुलाई में 8.29% हो गई।
इसमें कपड़े, पैकेज्ड फूड, साबुन, बर्तन, वाहन और इलेक्ट्रॉनिक सामान जैसी कई वस्तुएं शामिल होती हैं। कच्चे माल जैसे स्टील, प्लास्टिक, रबर और कपास की लागत बढ़ने पर कंपनियों की उत्पादन लागत बढ़ सकती है और उसका असर अंतिम कीमतों पर पड़ सकता है।
WPI में किसका कितना वजन?
थोक मूल्य सूचकांक में तीन प्रमुख हिस्से हैं:
- प्राइमरी आर्टिकल्स: 22.62%
- फ्यूल एंड पावर: 13.15%
- मैन्युफैक्चर्ड प्रोडक्ट्स: 64.23%
मैन्युफैक्चर्ड प्रोडक्ट्स का वजन सबसे ज्यादा होने के कारण इस क्षेत्र में कीमतों में बदलाव का WPI पर बड़ा असर पड़ता है।
आम आदमी पर क्या असर पड़ता है?
थोक महंगाई सीधे तौर पर आम ग्राहक की महंगाई नहीं बताती, लेकिन अगर उत्पादकों की लागत लगातार बढ़ती रहती है तो कंपनियां इसका बोझ आगे चलकर ग्राहकों पर डाल सकती हैं। इससे सामान, पैकेज्ड फूड, कपड़े और दूसरी रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है।
WPI और CPI में अंतर
भारत में महंगाई को मुख्य रूप से खुदरा महंगाई (CPI) और थोक महंगाई (WPI) के जरिए देखा जाता है।
CPI उन कीमतों को मापता है जो आम उपभोक्ता वस्तुओं और सेवाओं के लिए चुकाता है, जबकि WPI थोक बाजार में वस्तुओं की कीमतों में बदलाव को दर्शाता है।
यानी जुलाई में WPI में मामूली राहत जरूर मिली है, लेकिन खाद्य वस्तुओं और मैन्युफैक्चर्ड प्रोडक्ट्स की बढ़ती महंगाई पर नजर बनी हुई है।